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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 68

18 verse-groups

  1. Verses 1–26विद्वानों का यह निश्चित मत है कि चूँकि देह में अहंभावना करने से ही आत्मा देह के दुःखों से…
  2. Verses 27–28हे प्रिय श्रीरामचन्द्रजी, छोटे तालाब में गिरे हुए पत्ते, जल, मल और काष्ठ एक दूसरे से यद्य…
  3. Verse 29हे श्रीरामजी, संसार में अहन्ताध्यास ही समस्त प्राणियों के जरा, मरण और मोहरूपी वृक्षों का…
  4. Verse 30जो जीव अहन्ताध्यास युक्त है, वह इस संसाररूपी सागर में डूबा हुआ है और जो अहन्ताध्यास से नि…
  5. Verse 31अहन्ताध्यास से युक्त मन, काम आदि वृत्तियों की असंख्यता के कारण, अनन्त शाखा-प्रशाखाओं से य…
  6. Verses 32–33श्रीरामजी, आप मुझसे यह जान लीजिए कि जैसे भीतर से खण्डित हुए स्फटिक निर्मित लिंग आदि पूजा…
  7. Verse 34विषयों की आसक्ति से वर्जित और विक्षेप आदि मलों से रहित चित्त संसारी होता हुआ भी निःसंशय म…
  8. Verse 35जैसे बडे बड़े काष्ठ भारो को पार उतारनेवाली जलस्थ नौका स्वयं लकड़ी की होती हुई भी लकड़ी के…
  9. Verse 36जैसे स्वप्न में, जो सुख ओर दुःख दोनों से भरा है, वास्तव में कुछ न करने पर भी स्वप्नावस्था…
  10. Verse 37जैसे स्वप्नावस्था में देह की चेष्टा न होने पर भी चित्त की कर्तृता से आत्मा में कर्तृत्व व…
  11. Verse 38मन के कर्तृत्व न होने पर आत्मा का अकर्तापन स्पष्टरूप से सिद्ध हो जाता है, क्योकि शून्यचित…
  12. Verse 39कहीं कर्म के प्रति कारण नहीं है क्योकि चित्त में कर्तृत्व शक्ति नहीं हे, यह बात नहीं हे,…
  13. Verse 40यद्यपि मन भले ही कुछ करे, तथापि यदि वह उसमें आसक्त नहीं है, तो वह अकर्ता के सदृश ही है ।…
  14. Verse 41दूर देश में अवस्थित कान्ता में जिस पुरुष का मन आसक्त है, वह पुरुष जैसे सामने के कार्यों स…
  15. Verse 42अहन्ता आदि अनात्म अध्यासो से विनिर्मुक्त जीव विक्षेपो से शून्य सुखो का पूर्ण अनुभव करता ह…
  16. Verse 43आसक्ति का त्याग करने से ही सभी जीवन्मुक्त पुरुष के गुण मन में सिद्ध हो जाते है, इस आशय से…
  17. Verse 44उपसंहार करते हैं। हे श्रीरामजी, इससे सबके भीतर रहनेवाले आत्मा से भिन्न बाहर से लगे हुए पा…
  18. Verses 45–53हे राघव, तीक्ष्ण धारवाले तलवार आदि शस्त्र के समान नीले यमुना जल में मिश्रित हुआ स्फटिक मण…