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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 68, Verses 32–33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 68, verses 32–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 68 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

दिवि देवा भुवि नराः पाताले भोगिनोऽसुराः । ब्रह्माण्डोदुम्बरफले स्फुरन्मशकवत्स्थिताः ॥ ३२ ॥ जायन्ते च म्रियन्ते च निपतन्त्युत्पतन्ति च । भूतानि यदनन्तानि तरङ्गिणि तरङ्गवत् ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामजी, आप मुझसे यह जान लीजिए कि जैसे भीतर से खण्डित हुए स्फटिक निर्मित लिंग आदि पूजा के लिए अपावन यानी अयोग्य हो जाते हैं, वैसे ही विषयासक्त हुआ यह मन अपवित्र हो जाता है और जैसे खण्डित न हुए स्फटिक आदि से निर्मित लिंग आदि पवित्र रहते हैं, वैसे ही विषयों मे आसक्ति से वर्जित यह मन सदा सर्वदा पवित्र ही रहता है