Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 68, Verses 27–28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 68, verses 27–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 68 · श्लोक 27,28
संस्कृत श्लोक
लीलया ललनालानलीनं भूतिविभूषितम् ।
वन्द्यसंसक्तिवशतः शरीरं शाङ्करं स्थितम् ॥ २७ ॥
विज्ञानगतयः सिद्धा लोकपालास्तथेतरे ।
वन्द्यसंसक्तिवशतस्तिष्ठन्ति जगतोऽङ्गणे ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे प्रिय
श्रीरामचन्द्रजी, छोटे तालाब में गिरे हुए पत्ते, जल, मल और काष्ठ एक दूसरे से यद्यपि सम्बद्ध है,
तथापि अहन्ताध्यास से रहित होने के कारण जैसे दुःखी नहीं होते, ऐसे ही आत्मा, देह, इंद्रिय और मन
एक दूसरे से यद्यपि पर्याप्तरूप से सम्बद्ध है, तथापि अहन्ताध्यास का वास्तव में अभाव होने के कारण
वे परमार्थतः दुःख से रहित ही सदा सर्वदा रहते हैं