Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 68, Verse 36
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 68, verse 36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 68 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
नक्षत्रचक्रं गगने द्रुमे मशकसंततिः ।
स्फुरत्यावर्तवृत्त्यैव पातालेऽङ्ग जलौघवत् ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे स्वप्न में,
जो सुख ओर दुःख दोनों से भरा है, वास्तव में कुछ न करने पर भी स्वप्नावस्थायुक्त जीव को बाघ
आदि से जनित भय, पलायन आदि मेँ व्याकुलता हो जाती है, वैसे ही वास्तव में कर्ता न होने पर भी
जीव अहन्ता आदि के अध्यासवश कर्ता हो जाता हे