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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 68, Verse 34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 68, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 68 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

उत्पत्त्योत्पत्त्य लीयन्ते तत्संसक्तिविजृम्भितम् । भूतानि विरसं भूयो निर्झराम्बुकणा इव ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

विषयों की आसक्ति से वर्जित और विक्षेप आदि मलों से रहित चित्त संसारी होता हुआ भी निःसंशय मुक्त ही है ओर विषयो मे आसक्त चित्त चिरकालिक तपश्चर्या से युक्त होता हुआ भी अत्यन्त बन्धन से ग्रस्त ही है ॥३ ३॥ अहन्ता आदि अध्यास से युक्त मन संसाररूपी बन्धन से बँधा है ओर अहन्ता आदि अध्यास से रहित मन संसाररूपी बन्धन से छुटा हुआ है, अकेला अहन्ता अध्यास ही बन्ध ओर मोक्ष में कारण है