Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 68, Verse 37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 68, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 68 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
पातोत्पातदशाजीर्णं कालबालककन्दुकम् ।
अद्यापि न जहातीन्दुर्जलमामलिनं वपुः ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे स्वप्नावस्था में देह की चेष्टा न होने
पर भी चित्त की कर्तृता से आत्मा में कर्तृत्व विद्यमान है, वैसे ही पुत्र, सेवक आदि को देख रहे जाग्रदवस्था
युक्त आत्मा में देह की चेष्टा न होने पर भी स्पष्टरूप से चित्त की कर्तृता से कर्तृत्व विद्यमान है; यह
कर्तृत्व भी मुख्य कर्तृत्व के सदृश ही एक तरह से हैं, क्योकि विक्षुब्ध को (चंचल चित्त को) सुख दुःख
देखे जाते हैं