Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 68, Verse 41
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 68, verse 41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 68 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
संसक्तमनसामस्मिन्संसारे व्यवहारिणाम् ।
अत्ति तृष्णा शरीराणि तृणान्यग्निशिखा यथा ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
दूर देश में अवस्थित कान्ता में जिस पुरुष का मन आसक्त है, वह पुरुष जैसे सामने के कार्यों
से (शीत, उष्ण आदि के अनुभवरूप कार्यो से) लिप्त नहीं होता, वैसे ही आसक्ति वर्जित पुरुष
ब्रह्महत्या, अश्वमेघ आदि के पुण्य-पापों से लिप्त नहीं होता