Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 68, Verse 35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 68, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 68 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
परस्परनिगीर्णाङ्गा जनता जाड्यजर्जरा ।
संभ्रान्ता प्रभ्रमत्यङ्ग शीर्णपर्णमिवाम्वरे ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे बडे बड़े काष्ठ भारो को पार उतारनेवाली जलस्थ नौका
स्वयं लकड़ी की होती हुई भी लकड़ी के छेदन, भेदन, दहन आदि गुण-दोषों से तथा जल के चलन,
परिवर्तन, निर्मलपन, गन्देपन आदि गुण-दोषों से गुण-दोषवती नहीं होती, वैसे ही अहन्ता आदि
अध्यास से निर्मुक्त पुरुष शरीरयात्रार्थ सब कुछ करता हुआ भी, कर्ता नहीं होता