Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 44
तैंतालीसवाँ सर्ग समाप्त चौवालीसवाँ सर्ग मन की निराशता की सिद्धि के लिए दृश्य की व्यर्थ दुःखस्वरूपता का गाधि के आख्यान में विस्तार से प्रदर्शन ।
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- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, संसार नाम की यह माया अपरिमित भ्रान्ति की हेतु ह…
- Verse 2हे अनघ, जगन्मायाप्रपंच की विचित्रता के ज्ञान के लिये इस इतिहास को मैं आपसे कहूँगा । आप ध्…
- Verse 3मेरु पर्वत पर कल्पवृक्ष वन के समान इस पृथिवी तल में कोशलनामक विविध रत्नों का भंडार भूत दे…
- Verse 4वहाँ पर गाधि नाम से प्रख्यात कोई गुणवान ब्राह्मण हुआ । वह परम श्रोत्रिय, धीमान् ओर मूर्त…
- Verse 5जैसे निष्कलंक निर्मल आकाश में भुवन विराजमान् होता है वैसे ही बाल्यावस्था से विरक्त निष्क…
- Verse 6किसी अभीष्ट तपस्यारूप कार्य को अपना लक्ष्य बनाकर वह बंधुओं के समूह से हटकर तपस्या करने के…
- Verse 7वहाँ पर जैसे चन्द्रमा अतिदर्शनीय अश्विनी आदि तारों से मण्डित ओर प्रसन्न-निर्मल आकाश को प्…
- Verse 8भगवान विष्णु का दर्शन न मिले तब तक तपस्या करने के लिए वर्षाकाल के कमल के समान गले तक जल म…
- Verse 9तालाब के जल में डूबे हुए तथा निवास स्थानभूत तालाब के कमलों का सूर्य के वियोग से संकोच होन…
- Verse 10तदनन्तर एक समय जैसे वर्षा ऋतु में ग्रीष्म से संतप्त पृथिवी तल पर काला मेघ आता है, वैसे ही…
- Verse 11श्रीभगवान् ने कहा : हे विप्र, जल के मध्य से उठो, मनमाना वर लो । तुम्हारा नियमरूपी वृक्ष…
- Verse 12ब्राह्मण ने कहा : भगवान्, असंख्य ब्रह्माण्डों में विद्यमान प्राणियों के हृदयकमल मध्य में…
- Verse 13हे भगवान्, आपसे रचित इस संसार नामक माया को, जो परमात्मा में अध्यस्त हे ओर जीवों को अन्धा…
- Verse 14श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, "इस माया को तुम देखोगे और देखने के बाद इसका त्य…
- Verse 15भगवान् विष्णु के चले जाने पर वह उत्तम ब्राह्मण शीतल ओर निर्मल मूर्ति होने के कारण क्षीरस…
- Verse 16वह चन्द्रमा के दर्शन और स्पर्श से विकसित कमल की भाँति त्रिलोकी के अधिपति भगवान् के दर्शन…
- Verse 17तदनन्तर हरि भगवान् के दर्शन से आनन्द में मग्न हुए उसके वन में कितने ही दिन ब्राह्मणोचित…
- Verse 18एक समय जैसे महर्षि योगबल से अतीत ओर अनागत को देखने के विमान सरोवर में चिन्तन करते हैं वैस…
- Verse 19तदनन्तर स्नानविधि में सब पापों की निवृत्ति के लिए (अघमर्षण के लिए) उसने जल के भीतर कुशयुक…
- Verses 20–27जल में डूबकी लगा कर प्रणव आदि मन्त्रौ के स्मरणरूप उस अघमर्षण विधि में जल के मध्य में स्थि…
- Verse 28जैसे ओस बहा रहे सूखे पत्तों से वृक्ष परिवेष्टित होता है वैसे ही पास में बैठे हुए दुःखी अश…
- Verse 29वियोग के भय से मानों संयोग का त्याग कर रहे अतएव दूर हटे हुए हाथ, पैर आदि अंगों से अनात्मी…
- Verses 30–31परस्पर न सटे हुए ओठों से और कुछ मलिन सफेद दाँतों से अपने जीवन को इतने समय तक वृथा गया यों…
- Verse 32बान्धवों के रोने पीटने के कोलाहल से मिली हुई वाणियों को, किसका मेरे प्रति अधिक स्नेह ओर क…
- Verses 33–38तदनन्तर उस समय राशिभूत निरन्तर प्रलापों से व्याकुल चेष्टा वाले छाती पीटने के साथ मूर्च्छा…
- Verse 39सूखे हुए इन्धनो से खूब बढी हुई ज्वालाराशिरूपी जटा ओं से युक्त उस चिता ने चट-चट शब्दों से…
- Verse 40अग्नि ने, जिसने बढ़ रहे कट-कट शब्दों से ओर छोड़ी गई दुर्गन्ध से मेघमण्डल को व्याप्त कर दि…