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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 44

तैंतालीसवाँ सर्ग समाप्त चौवालीसवाँ सर्ग मन की निराशता की सिद्धि के लिए दृश्य की व्यर्थ दुःखस्वरूपता का गाधि के आख्यान में विस्तार से प्रदर्शन ।

27 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, संसार नाम की यह माया अपरिमित भ्रान्ति की हेतु ह…
  2. Verse 2हे अनघ, जगन्मायाप्रपंच की विचित्रता के ज्ञान के लिये इस इतिहास को मैं आपसे कहूँगा । आप ध्…
  3. Verse 3मेरु पर्वत पर कल्पवृक्ष वन के समान इस पृथिवी तल में कोशलनामक विविध रत्नों का भंडार भूत दे…
  4. Verse 4वहाँ पर गाधि नाम से प्रख्यात कोई गुणवान ब्राह्मण हुआ । वह परम श्रोत्रिय, धीमान्‌ ओर मूर्त…
  5. Verse 5जैसे निष्कलंक निर्मल आकाश में भुवन विराजमान्‌ होता है वैसे ही बाल्यावस्था से विरक्त निष्क…
  6. Verse 6किसी अभीष्ट तपस्यारूप कार्य को अपना लक्ष्य बनाकर वह बंधुओं के समूह से हटकर तपस्या करने के…
  7. Verse 7वहाँ पर जैसे चन्द्रमा अतिदर्शनीय अश्विनी आदि तारों से मण्डित ओर प्रसन्न-निर्मल आकाश को प्…
  8. Verse 8भगवान विष्णु का दर्शन न मिले तब तक तपस्या करने के लिए वर्षाकाल के कमल के समान गले तक जल म…
  9. Verse 9तालाब के जल में डूबे हुए तथा निवास स्थानभूत तालाब के कमलों का सूर्य के वियोग से संकोच होन…
  10. Verse 10तदनन्तर एक समय जैसे वर्षा ऋतु में ग्रीष्म से संतप्त पृथिवी तल पर काला मेघ आता है, वैसे ही…
  11. Verse 11श्रीभगवान्‌ ने कहा : हे विप्र, जल के मध्य से उठो, मनमाना वर लो । तुम्हारा नियमरूपी वृक्ष…
  12. Verse 12ब्राह्मण ने कहा : भगवान्‌, असंख्य ब्रह्माण्डों में विद्यमान प्राणियों के हृदयकमल मध्य में…
  13. Verse 13हे भगवान्‌, आपसे रचित इस संसार नामक माया को, जो परमात्मा में अध्यस्त हे ओर जीवों को अन्धा…
  14. Verse 14श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, "इस माया को तुम देखोगे और देखने के बाद इसका त्य…
  15. Verse 15भगवान्‌ विष्णु के चले जाने पर वह उत्तम ब्राह्मण शीतल ओर निर्मल मूर्ति होने के कारण क्षीरस…
  16. Verse 16वह चन्द्रमा के दर्शन और स्पर्श से विकसित कमल की भाँति त्रिलोकी के अधिपति भगवान्‌ के दर्शन…
  17. Verse 17तदनन्तर हरि भगवान्‌ के दर्शन से आनन्द में मग्न हुए उसके वन में कितने ही दिन ब्राह्मणोचित…
  18. Verse 18एक समय जैसे महर्षि योगबल से अतीत ओर अनागत को देखने के विमान सरोवर में चिन्तन करते हैं वैस…
  19. Verse 19तदनन्तर स्नानविधि में सब पापों की निवृत्ति के लिए (अघमर्षण के लिए) उसने जल के भीतर कुशयुक…
  20. Verses 20–27जल में डूबकी लगा कर प्रणव आदि मन्त्रौ के स्मरणरूप उस अघमर्षण विधि में जल के मध्य में स्थि…
  21. Verse 28जैसे ओस बहा रहे सूखे पत्तों से वृक्ष परिवेष्टित होता है वैसे ही पास में बैठे हुए दुःखी अश…
  22. Verse 29वियोग के भय से मानों संयोग का त्याग कर रहे अतएव दूर हटे हुए हाथ, पैर आदि अंगों से अनात्मी…
  23. Verses 30–31परस्पर न सटे हुए ओठों से और कुछ मलिन सफेद दाँतों से अपने जीवन को इतने समय तक वृथा गया यों…
  24. Verse 32बान्धवों के रोने पीटने के कोलाहल से मिली हुई वाणियों को, किसका मेरे प्रति अधिक स्नेह ओर क…
  25. Verses 33–38तदनन्तर उस समय राशिभूत निरन्तर प्रलापों से व्याकुल चेष्टा वाले छाती पीटने के साथ मूर्च्छा…
  26. Verse 39सूखे हुए इन्धनो से खूब बढी हुई ज्वालाराशिरूपी जटा ओं से युक्त उस चिता ने चट-चट शब्दों से…
  27. Verse 40अग्नि ने, जिसने बढ़ रहे कट-कट शब्दों से ओर छोड़ी गई दुर्गन्ध से मेघमण्डल को व्याप्त कर दि…