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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 44, Verses 30–31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 44, verses 30–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 30, 31

संस्कृत श्लोक

परस्परमलग्नाभ्यामोष्ठाभ्यां दशनैः सितैः । सविरागमिवाम्लानैर्हसन्तं स्वात्मजीवितम् ॥ ३० ॥ मौनध्यानमिवापन्नं पङ्कादिव विनिर्मितम् । अप्रबोधाय संसुप्तं विश्राम्यन्तमिवोच्चकैः ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

परस्पर न सटे हुए ओठों से और कुछ मलिन सफेद दाँतों से अपने जीवन को इतने समय तक वृथा गया यों हँस रहे विरक्त पुरुष, के समान मौन ध्यान को प्राप्त हुआ-सा, पंक से बनाया हुआ-सा, फिर न जागने के लिए सोया-सा, दीर्घ विश्राम कर रहा-सा था