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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 44, Verses 20–27

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 44, verses 20–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 20-27

संस्कृत श्लोक

अन्तर्जलविधौ तस्मिन्विस्मृतध्यानमन्त्रधीः । पर्यस्तसंवित्प्रसरः सोऽपश्यज्जलमध्यतः ॥ २० ॥ मृतमात्मानमात्मीये सदने शोच्यतां गतम् । पतितं वातवेगेन कन्दरान्तरिव द्रुमम् ॥ २१ ॥ प्राणापानप्रवाहेण मुक्तमन्तमुपागतम् । संशान्तावयवस्पन्दं निर्वात इव खण्डकम् ॥ २२ ॥ पाण्डुराननमाम्लानं वृक्षपर्णमिवारसम् । शवीभूतमिवाग्लानं छिन्ननालमिवाम्बुजम् ॥ २३ ॥ विपर्यस्तेक्षणं प्रातर्मग्नतारमिवाम्बरम् । सावग्रहमिव ग्रामं सर्वतः पांसुधूसरम् ॥ २४ ॥ बाष्पक्लिन्नमुखैर्दीनैः करुणाक्रन्दकारिभिः । आवृतं बन्धुभिः खिन्नैः कुररैरिव पादपम् ॥ २५ ॥ सेतुभंगगलद्वारिह्रियमाणमुखाब्जया । नलिन्या समधर्मिण्या भार्यया पादयोः श्रितम् ॥ २६ ॥ ताराक्रन्दरणद्रेफप्रलापालापलुब्धया । मात्रा गृहीतं चिबुके नवव्यञ्जनलाञ्छिते ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

जल में डूबकी लगा कर प्रणव आदि मन्त्रौ के स्मरणरूप उस अघमर्षण विधि में जल के मध्य में स्थित उसके मन्त्र, ध्यान आदि विस्मृत हो गये और ज्ञान विपरीत ग्रहणोन्मुख हो गया । उसने अपने घर पर अपने को वायु वेग से कन्दरा के बीच में गिरे हुए वृक्ष के समान मृत ओर शोचनीयता को प्राप्त हुआ देखा । उसने अपने को प्राण ओर अपान वायुओं के प्रवाह से मुक्त, नाश को प्राप्त हुआ, निर्वात स्थान में गिरे हुए कदली के वृक्ष आदि के समान प्रशान्त अवयव चेष्टावाला, पीले मुँहवाला, वृक्ष के सूखे हुए पत्ते के समान मुरञ्माया हुआ, शव हुआ-सा, जिसकी नाल कट गई हो ऐसे कमल के समान कुम्हलाया हुआ, प्रातःकाल जिससे तारे अस्त हो गये ऐसे आकाश के समान अस्त नेत्र वाला देखा । वह अनावृष्टि से ग्रस्त ग्राम के समान चारों ओर धूलि से धूसरित था, करुण विलाप करनेवाले दुःखी दीन बन्धुओंसे, जिनका मुँह बाष्पधारा से आर्द्रं था, वह ऐसे परिवृत था जैसे कुरर नामक पक्षियों से वृक्ष आवृत होता हे । बाँध के टूट जाने से बह रहे जल से जिसका मुखरूप कमल हरा जा रहा हो, ऐसी कमलिनी के तुल्य भार्या ने उसके चरण परड रक्खे थे । ऊँचे गूँज रहे (रोदन कर रहे) भोरों के समान प्रलाप ओर दीर्घ स्वर के आलाप में आसक्त माँ ने उसकी ठुड्डी, जो नूतन मूँछ-दाढी से युक्त थी, पकड रक्खी थी