Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 44, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 44, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
रामापर्यवसानेयं माया संसृतिनामिका ।
आत्मचित्तजयेनैव क्षयमायाति नान्यथा ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, संसार नाम की यह माया अपरिमित भ्रान्ति की हेतु है ।
यह अपने चित्त पर विजय पाने से ही क्षय को प्राप्त होती है । अन्यथा नहीं
सर्ग सन्दर्भ
तैंतालीसवाँ सर्ग समाप्त चौवालीसवाँ सर्ग मन की निराशता की सिद्धि के लिए दृश्य की व्यर्थ दुःखस्वरूपता का गाधि के आख्यान में विस्तार से प्रदर्शन ।