Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 44, Verse 40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 44, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
अभ्युल्लसत्कटकटारवमुक्तगन्धव्याप्ताम्बुवाहपटलोऽस्थिचयं हुताशः ।
दन्ती सरन्ध्रमिव वेणुवनं समन्तादुद्वान्तमेदुररसं दलयांचकार ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
अग्नि ने, जिसने बढ़ रहे कट-कट शब्दों से ओर छोड़ी गई दुर्गन्ध से
मेघमण्डल को व्याप्त कर दिया था, उसकी अस्थि राशि को, जिससे बढ़े हुए रस निकल चुके थे, जैसे
हाथी सूराखवाले बाँस के समूह को चारों ओर विदलित कर देता है वैसे ही विदलित कर दिया