Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 8
सातवाँ सर्ग समाप्त आठवाँ सर्ग स्वर्गीय विविध सुखो के भोग के अनन्तर भूलोक में आये हुए शुक्र का वासनावश अनेक जन्मों का तथा तपस्विता का वर्णन |
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- Verse 1श्रीवसिष्टजी ने कहा : वत्स श्री रामचन्द्रजी, इस प्रकार चित्त के विलास से चिरकाल तक कल्पित…
- Verses 2–3मन्दार के फूलों की मालाओं से लदी हुई तथा देवताओं के उपभोग योग्य अमृत या मदिरा से मस्त हुई…
- Verse 4चन्द्रमा की कलाओं से निर्मित शरीरवाले देवताओं के साथ उस विलासी ने पारिजात की लताओं के निक…
- Verse 5झूला झूलने के लिए व्यग्र हुई विद्याधरियों के साथ कुबेर के मनोहर चैत्ररथ नामक उद्यान में ल…
- Verse 6जैसे मन्दराचल समुद्र मे अवलोडन करता है वैसे ही उसने श्री शिवजी के पार्षदो के साथ नन्दनवन…
- Verse 7नूतन -नूतन सुवर्ण की लताओं से व्याप्त सुमेरू पर्वत की नदियों ओर भूमियों मे उसने इस प्रकार…
- Verse 8उस विलासी ने उस अप्सरा के साथ कैलासवन के कुंजों में श्रीशिवजी के मस्तक पर विराजमान चन्द्र…
- Verse 9श्री शुक्राचार्य ने गन्धमादन पर्वत के ऊपर के शिखरो पर विश्राम लेकर उस सुन्दरी को सिर से ल…
- Verse 10हे श्रीरामचन्द्रजी, लोकालोक पर्वत के तटों के आसपास की भूमिय में, जो विविध आश्चर्यो से भरप…
- Verse 11मन्दराचल के मध्यवर्ती जलप्राय शीतल प्रदेशों में उसने मृगो के साथ अपने मन से कल्पित देवमन्…
- Verse 12स्त्री के साथ निवास करनेवाले श्री शुक्राचार्य का क्षीरसागर के तटों में श्वेतद्वीप के लोगो…
- Verse 13गन्धर्वनगर के उद्यानों की क्रीड़ाओं के निर्माण से एकमात्र मनोरथ द्वारा अनन्त संसारों की स…
- Verse 14तदनन्तर श्री शुक्राचार्य ने उस मृगनयनी के साथ पुनः स्वर्ग में सुखपूर्वक आठ चौकड़ियों तक न…
- Verse 15तदुपरान्त स्वर्ग से पतन के स्मरण के भय से जिनका दिव्य शरीर गल गया था, ऐसे श्री शुक्राचार्…
- Verse 16जिनके सब दिव्य अंग- प्रत्यंग कट गये थे और विमान, नन्दनवन तथा वस्त्र, आभूषण आदि के उपभोग क…
- Verse 17दीर्घ चिन्ता के साथ भूमण्डल पर गिरे हुए उनके शरीर के शिला के ऊपर गिरे हुए झरने की धार के…
- Verse 18उन दोनों के खण्ड-खण्ड हुए दो शरीरों के लिंग शरीर दुःख से मलिन होकर जिनके घोंसले नष्ट हो ग…
- Verse 19आकाश में वे दो लिंग शरीर चन्द्रमा की किरणों में प्रविष्ट हुए। तदनन्तर तुरन्त ओस की बूँद ब…
- Verse 20पके हुए उन धानों को दशार्ण देश निवासी ब्राह्मण ने खाया। वह शुक्राचार्य वीर्य बनकर उस ब्रा…
- Verse 21ब्राह्मण के घर जन्म लेने के अनन्तर मुनियों के साथ संगति होने से घोर तपस्या में स्थित हुआ…
- Verses 22–23वहाँ पर उसका शापवश मृगी बनी हुई उस अप्सरा से नराकार पुत्र उत्पन्न हुआ | पुत्र के स्नेह से…
- Verse 24मेरे इस पुत्र के धन हो, बड़े उत्तम गुण हों, बड़ी आयु हो इस प्रकार सदा बनी रहनेवाली चिन्ता…
- Verse 25एकमात्र भोगों की चिन्ता के साथ उसके प्राणपखेरू उड़े थे, अतएव वह मद्रदेशाधिपति का लडका बनक…
- Verse 26मद्रदेश में चिरकाल तक निष्कण्टक राज्य करके जैसे कमल हिमरूपी वज्र को प्राप्त होता हे वैसे…
- Verse 27तप की वासना के यानी वानप्रस्थ के धर्मचिन्तन के साथ उसने वह सुन्दर मद्रराज का शरीर छोड़ा थ…
- Verse 28हे श्रीरामजी, शान्ति आदि से राग आदिसन्तापों का निरास कर चुके उस महामति तपस्वी ने समंगा ना…
- Verse 29वह पूर्वोक्त शुक्राचार्य नाना प्रकार की वासनाओं से वासित होकर उन वासना ओं के अनुसार प्राप…