Guru's AddaGuru's Adda

Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 7

छठा सर्ग समाप्त सातवाँ सर्म स्वर्ग में शुक्र का पुनः अपनी प्रिया को देखना और परस्पर के प्रेमाधिक्य से दोनों का संगम होना।

27 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे वत्स श्रीरामचन्द्रजी , पूर्वोक्त मनोराज्य के प्रभाव से शुक्राचार…
  2. Verse 2इन्द्र के समीप में एक मुहूर्त भर विश्राम कर श्री शुक्राचार्य स्वर्ग मे चलनेवाले देवताओं स…
  3. Verse 3स्वर्ग की शोभा को ओर अपनी सुन्दरता को स्त्रीजनो की अत्यन्त अभीष्ट जानकर जैसे सारस कमलिनी…
  4. Verse 4श्री शुक्राचार्यजी ने वन के मध्य में स्थित आम्रलता के समान वहाँ पर अप्सराओं के मध्य में ब…
  5. Verse 5हे श्रीरामचन्द्रजी, वह अप्सरा भी श्री शुक्राचार्य को देखकर मोहित हो गई ओर शुक्राचार्य भी…
  6. Verse 6पसीने से सराबोर शरीर वाले शुक्राचार्यजी ने उस सुन्दर अप्सरा को ऐसे देखा, जैसे कि चन्द्रका…
  7. Verses 7–8रात्रि में वियोग होने के उपरान्त रोदन करनेवाली चक्रवाकी जैसे प्रातःकाल में चक्रवाक द्वारा…
  8. Verse 9चूँकि स्वर्गरूप देश संकल्पित अर्थ को देनेवाला हे, अतएव सम्पूर्णं अंग को विवश करके उसके द्…
  9. Verse 10जैसे कमलिनी के पत्तों पर मेघो की धाराएँ गिरती है वैसे ही उसके कोमल अंगो पर काम के एक-आध न…
  10. Verse 11कामदेव से कम्पित तथा भवर के तुल्य चंचलकंकणों से युक्त वह मन्द-मन्द वायु से हिलाई गई भँवरो…
  11. Verse 12जैसे मदोन्मत्त हाथी कमलिनी को रोद डालता है वैसे ही नीलकमल के सदुश नयनवाली तथा हंस ओर सारस…
  12. Verse 13तदनन्तर सफल संकल्पवाले शुक्राचार्य ने उस सुन्दरी की वैसी दशा देखकर जैसे रुद्र प्रलयकाल मे…
  13. Verse 14जैसे भूलोक के अन्धकार से लोकालोक पर्वत का तट भर जाता हे वैसे ही शुक्राचार्य द्वारा संकल्प…
  14. Verses 15–17लज्जारूपी अन्धकार के लिए सूर्यस्वरूप यानी लज्जारूपी अन्धकार का निवारण करनेवाली उक्त अन्धक…
  15. Verse 18जैसे श्रीविष्णु भगवान क्षीरसागर में प्रवेश करते हैं वैसे ही शुभ्रभवन के मध्य में स्थित सज…
  16. Verse 19वह सुन्दरी भी भृगुपुत्र के हाथों को पकड़कर वहाँ पर प्रविष्ट हुई । मारे लज्जा के नतवदन वह…
  17. Verse 20प्रेम ओर स्नेह से सराबोर वाणी से उसने यह मधुर वचन कहा । उसके उस मधुर वचन में प्रत्येक अक्…
  18. Verse 21हे चन्द्रवदन, देखिये, यह कामदेव अपने धनुष को पूर्णरूप से तानकर मुझ अबला को पशोपेश में डाल…
  19. Verse 22इसलिए हे नाथ, आप मेरी रक्षा कीजिये । मेँ अबला हूँ ओर दीन हूँ। आप ही यहाँ पर मेरे शरण हैं…
  20. Verse 23हे महामते, स्नेहदृष्टि को न जाननेवाले मूढजन ही अत्यधिक प्रीति की अवहेलना करते है, रसज्ञ ल…
  21. Verse 24चन्द्रमाओं से भी प्रियतम का प्रेम बढ़ा-चढा यह भाव है
  22. Verse 25यह त्रिलोकी का ऐश्वर्य चित्त को वैसा आनन्द नहीं देता जैसा कि पहले-पहल अनुकृत हुए प्रियतमो…
  23. Verse 26हे सम्मान करनेवाले शुक्राचार्यजी, जैसे रात्रि मे चन्द्रमा की किरणों से संस्पृष्ट कमलिनी व…
  24. Verse 27हे सुन्दर, जैसे चपलचकोरी चन्द्रमा की किरणों के रसपान से जीवित रहती है वैसे ही मैं आपके स्…
  25. Verse 28हे प्राणनाथ, चरणों में लीन हूई इस भ्रमरी रूप मेरे हाथरूपी पल्लवो से आलिंगन कर आप मुझे स्न…
  26. Verse 29यह कहकर कल्पवृक्ष की मंजरी के तुल्य जिसके नयनरूपी भवर मद से घूम रहे थे, तथा फूलों के तुल्…
  27. Verse 30जैसे केसर से पीले हुए वायु से कम्पित पद्यिनी में परस्पर अनुरक्त भँवरी ओर भँवर प्रवेश करते…