Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 7, Verses 15–17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 7, verses 15–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 7 · श्लोक 15-17
संस्कृत श्लोक
भूलोकस्यान्धतमसा लोकालोकतटो यथा ।
लज्जान्धकारतीक्ष्णांशौ तस्मिंस्तिमिरमण्डले ॥ १५ ॥
प्रतिष्ठामागते तस्य मिथुनस्येव मण्डले ।
तेषु सर्वेषु भूतेषु गतेष्वभिमतां दिशम् ॥ १६ ॥
तस्मात्प्रदेशाद्भूलोके दिनान्ते विहगेष्विव ।
सा दीर्घचञ्चलापाङ्गी प्रवृद्धमदनव्यथा ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
लज्जारूपी अन्धकार के
लिए सूर्यस्वरूप यानी लज्जारूपी अन्धकार का निवारण करनेवाली उक्त अन्धकार राशि के नन्दनवन
में स्त्री पुरुषों के जोड के तुल्य स्थिरता को प्राप्त होने पर तथा उसकी सब सखियों के सायंकाल के
समय भूलोक में चिड़ियों की नाई उस प्रदेश से अपने-अपने अभिमत स्थानों में चले जाने पर बड़े-बड़े
ओर चंचल नेत्रप्रान्तवाली तथा बढी-चढ़ी कामपीडावाली वह जैसे मयूरी मेघ के समीप जाती है वैसे ही
भृगुपुत्र श्रीशुक्राचार्य के समीप में आई