Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 43
बयालीसवाँ सर्ग समाप्त तैंतालीसवाँ सर्ग जीवों की कर्मगति का विस्तार से वर्णन एवं विवेक आदि के अत्यन्त दुर्लभ होने से किन्हीं -किन्हीं की मुक्ति होती है, यह वर्णन ।
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- Verses 1–2इस प्रकार मन की स्ववन्धकता का प्रकार कह कर उस मन से उपहित चिद्रूप जीवों की जब तक मोक्ष न…
- Verse 3अपनी वासनामय दशा के आवेश से वे आशा के वशवर्ती हुए हैं और इस अतिविचित्र दशाओं में स्वयं आब…
- Verse 4निरन्तर हर एक दिशा में, प्रत्येक देश में, जल में और स्थल में जल में बुद्बुदों की तरह वे य…
- Verses 5–7किन्हीने इस कल्प में एक ही जन्म प्राप्त किया है और किन्हीं के सौ से भी अधिक जन्म हो गये ह…
- Verse 8कोई बड़े-बड़े क्लेशो को (नरकं को) सहते हैं, कोई अल्प सुखवाले (मनुष्य) हैं, कोई अत्यन्त प्…
- Verse 9कोई किन्नर, गन्धर्व, विद्याधर तथा नागों की योनियों में हैं और कोई सूर्य, इन्द्र, वरूण हैं…
- Verse 10कोई कूष्माण्ड, वेताल, यक्ष, राक्षस पिशाचरूप से स्थित हैं तथा कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्…
- Verse 11कोई म्लेच्छ, चाण्डाल और किरात की योनि में उत्पन्न अधम जातियों मे स्थित हे, कोई तृण ओर औषध…
- Verse 12तो कोई भाँति-भाँति की लताओं, झाड़ियों, तिनकों और पर्वतों के रूप में चारों ओर विद्यमान हैं…
- Verse 13कोई अपने वैभव से संसार में भ्रमण करनेवाले मन्त्री, सामन्त और राजा के रूप में विद्यमान हैं…
- Verse 14कोई साँप, अजगर, कीड़े, मकोड़े ओर चींटियो के रूप में स्थित हैं, कोई सिंह, भस, मृग, बकरे, च…
- Verse 15कोई सारस, चकोर, बलाका, बतक, कोकिल के रूप में है, तो कोई तो कमल, कलार (श्वेतकमल), कुमुद और…
- Verse 16कोई हाथी के बच्चे, हाथी, वराह, बैल, गदहे के रूप में है, तो कोई भँवर, मच्छर, डाँस की योनिय…
- Verse 17कोई बड़ी-बड़ी आपत्तियों से आक्रान्त हैं, तो कोई बड़े समृद्धिशाली हैं, कोई स्वर्ग में विरा…
- Verse 18कोई तारा समूह में स्थित हैं, तो दूसरे वृक्षों के छिद्रों में बैठे हैं, कोई आवह, प्रवाह आद…
- Verse 19कोई सूर्य की किरणों में (रस खींचने के अधिकार में) स्थित है, तो कोई चन्द्रमा की किरणों में…
- Verse 20कोई मोक्ष के समुचित पात्र जीवन्मुक्त हो यहाँ पर भ्रमण करते हैं, कोई चिरकाल से मुक्त होकर…
- Verse 21किन्हीं कल्याण भाजन जीवों की चिरकाल में मुक्ति होनेवाली है, तो कोई जीव भोगलम्पट होकर आत्म…
- Verse 22कोई विशाल दिकृपाल देवता हैं, तो कोई महावेगवाली नदियाँ हैं । कोई मनोहर नेत्रवाली स्त्रियाँ…
- Verse 23किन्हीं लोगों की बुद्धि अत्यन्त प्रबुद्ध है, ते किन्हीं का हृदय अत्यन्त जड है। कोई ज्ञान…
- Verses 24–25ये सभी जीव संसार की अनर्थकारिणी वासना से ही हुए हैं, इसलिए वासना का ही समूल उच्छेद करना च…
- Verse 26सैकड़ों आशारूप फन्दों से बँधे हुए, तथा वासनारूप भावी देहों को धारण करनेवाले जीव जैसे पक्ष…
- Verses 27–28अविद्या से, जो कि अनन्त विषयों में अनन्त संकल्प-कल्पनाओं की उत्पत्ति में हेतु है, इस जगद्…
- Verses 29–32यदि कोई कहे, विवेकी पुरुषों को आत्मसाक्षात्कार से क्या लाभ होता है ? इस पर कहते हैं। आत्म…
- Verse 33विवेक शून्य लोगों की जो गति होती है, उसे कहते हैं। कोई अविवेकी लोग हजारों जन्मों का भोगकर…
- Verse 34हे श्रीरामचन्द्रजी, कोई जीवराशियाँ तिर्यक् योनि को प्राप्त होती हैं, तो कोई देवत्व को प्…
- Verse 35जैसे यह विशाल ब्रह्माण्ड है वैसे ही और विशाल ब्रह्माण्ड भी बहुत से विद्यमान है, पहले थे औ…
- Verse 36अन्यान्य विचित्र क्रम से ओर अन्यान्य विचित्र हेतुओं से उनकी विचित्र सृष्टियाँ आविर्भूत हो…
- Verse 37इस ब्रह्माण्ड की तरह अन्यान्य ब्रह्माण्ड में भी कर्मो की विचित्रता से जीवों की गति विचित्…
- Verse 38इस ब्रह्माण्ड में लोग जिस मनुष्य आदि के उचित व्यवहार से स्थित है, उसी व्यवहार से अन्यान्य…
- Verse 39यदि कहे भले ही ऐसा हो, फिर उत्तमता, अधमता आदिरूप से और परस्पर स्नेह, विरोध आदिरूप से उन ज…
- Verse 40जैसे नदीं की तरंगें आविर्भाव और तिरोभाव द्वारा उन्मज्जन और निमज्जन से परिवर्तित होती हैं…
- Verses 41–44सत्व आदि गुणों के अधीन अन्तःकरण आदि की सृष्टि से अन्तःकरणोपाधिकजीव के आविर्भाव की प्रसिद्…
- Verse 45इस विषय में श्रुति आदि में प्रसिद्ध दृष्टान्त कहते हैं। दीप से प्रकाश की तरह, सूर्य से कि…