Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 43, Verses 24–25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 43, verses 24–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 24, 25
संस्कृत श्लोक
जीवाः स्ववासनावेशविवशाशयतां गताः ।
एतास्वेतास्ववस्थासु संस्थिता बद्धभावनाः ॥ २४ ॥
विहरन्ति जगत्केचिन्निपतन्त्युत्पतन्ति च ।
कन्दुका इव हस्तेन मृत्युनाऽविरतं हताः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
ये सभी जीव संसार की अनर्थकारिणी वासना से ही हुए हैं, इसलिए वासना का ही समूल उच्छेद
करना चाहिये, इस आशय से उपसंहार करते हैं।
अपनी वासना के आवेश से विवश बुद्धिवाले जीव इन-इन उपरोक्त सभी अवस्थाओं में
बद्धभावनावाले होकर स्थित हैं । इसमें कुछ तो पृथिवी में विहार करते हैं, कुछ नरक में गिरते हैं और
कुछ स्वर्ग में जाते हैं सचमुच मृत्यु से निरन्तर आहत हुए इन लोगों की अवस्था हाथ से पुनः पुनः
ताडित गेंद की तरह है