Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 43, Verse 45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 43, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
अविरतमियमातता तथोच्चैर्भवति विनश्यति वर्धते मुधैव ।
त्रिभुवनरचनादिमोहमाया परमपदे लहरीव वारिराशौ ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस विषय में श्रुति आदि में प्रसिद्ध दृष्टान्त कहते हैं।
दीप से प्रकाश की तरह, सूर्य से किरणों की तरह, तपे हुए लोहे से लोह कणों की तरह, अग्नि से
चिन्गारियों की तरह, समय से विचित्र ऋतुओं की तरह, फूलों से सुगन्ध की तरह, वर्षा के परमाणुओं से
तुषार की तरह और समुद्र से लहरों की तरह जीवराशियाँ बार-बार उत्पन्न हो-होकर चिरकालतक देह
परम्परा को भोगकर प्रलय काल में बीजभूत शान्त पद में अपने-आप ही विलीन हो जाती हैं ॥४ २-४ ४॥
पूर्वोक्त जीव-जगत की सृष्टि का संक्षेप से उपसंहार करते हैं।
यह त्रिभुवनरचना आदि की भ्रान्तिरूप माया समुद्र में लहरों की तरह परम पद में निरन्तर व्यर्थ ही
विस्तृत है, बढ़ती है, परिणाम को प्राप्त होती है और नष्ट होती है