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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 43, Verses 29–32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 43, verses 29–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

दृष्ट्वात्मानमसत्त्यक्त्वा सत्यामासाद्य संविदम् । कालेन पदमागत्य जायन्ते नेह ते पुनः ॥ २९ ॥ भुक्त्वा जन्मसहस्राणि भूयः संसारसंकटे । पतन्ति केचिदबुधाः संप्राप्यापि विवेकिताम् ॥ ३० ॥ केचिच्छक्तत्वमप्युच्चैः प्राप्य तुच्छतया धिया । पुनस्तिर्यक्त्वमायान्ति तिर्यक्त्वान्नरकानपि ॥ ३१ ॥ केचिन्महाधियः सन्त उत्पद्य ब्रह्मणः पदात् । तदैव जन्मनैकेन तत्रैवाशु विशन्त्यलम् ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई कहे, विवेकी पुरुषों को आत्मसाक्षात्कार से क्या लाभ होता है ? इस पर कहते हैं। आत्मसाक्षात्कार के अनन्तर असत्‌ का त्यागकर सत्य ज्ञान को प्राप्तकर भूमिकाओं की दृढ़ता के क्रम से परम पद को प्राप्त होकर विवेकी पुरुष इस संसार में फिर उत्पन्न नहीं होते