Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 43, Verse 34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 43, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
अन्ये प्रयान्ति तिर्यक्त्वमन्ये च सुरतामपि ।
अन्येऽपि नागतां राम यथैवेह तथैव हि ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे
श्रीरामचन्द्रजी, कोई जीवराशियाँ तिर्यक् योनि को प्राप्त होती हैं, तो कोई देवत्व को प्राप्त होते हैं,
कोई नागयोनि को प्राप्त होती हैं, तो कोई जैसे इस ब्रह्माण्ड में थी वैसे ही दूसरे ब्रह्माण्डों में भी होती
हैं