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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 43, Verse 33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 43, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

ब्रह्माण्डेष्वितरेष्वन्ये तेष्वन्ये जीवराशयः । प्रयान्तिपद्मोद्भवतामन्ये च हरतामपि ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

विवेक शून्य लोगों की जो गति होती है, उसे कहते हैं। कोई अविवेकी लोग हजारों जन्मों का भोगकर विवेक को प्राप्त करके भी फिर इस संसाररूपी संकट में गिरते हैँ । कुछ लोग देव, गन्धर्व, ब्राह्मण आदि उत्तम जन्म, उत्तम देश, उत्तम काल, उत्तम प्रतिभा, विनय, सत्संगति आदि सम्पत्ति को प्राप्त करके भी तुच्छ विषयों में लम्पटतावश अपनी बुद्धि से ही फिर तिर्यक्‌ योनि को प्राप्त होते हैं और तिर्यक्‌ योनियों से नरकों को भी प्राप्त होते हैं ॥ ३ ०, ३ १॥ कोई महामति सनक आदि महात्मा पुरुष ब्रह्मपद से उत्पन्न होकर उसी कल्प में एक ही जन्म द्वारा मोक्षरूप ब्रह्मपद में ही शीघ्र प्रविष्ट हो जाते हैं ॥ ३ २॥ कोई जीवराशियाँ अपने उत्पत्तिस्थानरूप ब्रह्माण्डों से अन्य ब्रह्माण्डों में प्राप्त होती हैं, कोई अपने उत्पत्तिस्थानरूप ब्रह्माण्डों में ही उत्पन्न होती हैं, कोई हिरण्यगर्भ स्वरूपता को प्राप्त होती हैं और कोई शंकरस्वरूपता को प्राप्त होती हैं