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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 43, Verses 5–7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 43, verses 5–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 5-7

संस्कृत श्लोक

केचित्प्रथमजन्मानः केचिज्जन्मशताधिकाः । केचिद्वाऽजन्मसंख्याकाः केचिद्धित्रिभवान्तराः ॥ ५ ॥ भविष्यज्जातयः केचित्केचिद्भूतभवोद्भवाः । वर्तमानभवाः केचित्केचित्त्वभवता गताः ॥ ६ ॥ केचित्कल्पसहस्राणि जायमानाः पुनः पुनः । एकामेवास्थिता योनिं केचिद्योन्यन्तरं श्रिताः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

किन्हीने इस कल्प में एक ही जन्म प्राप्त किया है और किन्हीं के सौ से भी अधिक जन्म हो गये हैं। किन्हीं के जन्मों की संख्या ही नहीं है, किन्हीं के दो या तीन जन्मान्तर ८१४ श्री योगवारिष्ठमहारामायण [स्थिति प्रकरण हुए हैं, किन्हींके जन्म आगे होनेवाले हैं यानी इस कल्प में अभी उत्पन्न ही नहीं हुए है, किन्हीं के जन्म बीत चुके है यानी जीवन्मुक्त है । किन्हीं के जन्म हो रहे हैं और कोई विदेहमुक्ति को प्राप्त हो गये है, कोई हजारों कल्पो से बारबार उत्पन्न हो रहे हैं, कोई एक ही योनि में स्थित है, कोई अन्यान्य योनियं को प्राप्त हो रहे हैँ