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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 43, Verses 41–44

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 43, verses 41–44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 41

संस्कृत श्लोक

निर्यान्त्यविरतं तस्मात्परस्माज्जीवराशयः । अनिर्देश्याः स्वसंवेद्यास्तत्रैवाशु स्फुरन्ति च ॥ ४१ ॥ दीपादिवालोकदृशः सूर्यादिव मरीचयः । कणास्तप्तायस इव स्फुलिङ्गा इव पावकात् ॥ ४२ ॥ कालादिवर्तवश्चित्रा आमोदाः कुसुमादिव । शीतला इव वर्षाणुपूरादब्धेरिवोर्मयः ॥ ४३ ॥ उत्पत्त्योत्पत्त्य कालेन भुक्त्वा देहपरम्पराम् । स्वत एव पदे यान्ति निलयं जीवराशयः ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

सत्व आदि गुणों के अधीन अन्तःकरण आदि की सृष्टि से अन्तःकरणोपाधिकजीव के आविर्भाव की प्रसिद्धि है, इस आशय से कहते हैं। उस परम पद से अनिर्देश्य और स्वसंवेद्य जीवराशियाँ निरन्तर आविर्भूत होती हैं और उसी में स्पष्टरूप से व्यवहार करती हैं