Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 2
18 verse-groups
- Verses 1–3दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है, ऐसा कहते हैं । (सदेव सोम्येदमग्र आसीत्" इत्यादि श्रुतिवाक्य स…
- Verse 4यदि सहकारी कारणों के अभाव में भी रज्जुमें सर्पादि के समान जगद्रूपी अंकुर आविर्भूत हुआ है,…
- Verse 5उक्त अर्थ को ही स्पष्ट करते हैं। सृष्टि के आरम्भ में सृष्टि रूप से यथा स्थित निराकार ब्रह…
- Verse 6यदि कोई कहे, प्रलय में सम्पूर्ण जगत की सत्ता का स्वीकार करने से सहकारी कारणों की दुर्लभता…
- Verse 7इस प्रकार सांख्य आदि की कल्पना बालक की कल्पना के तुल्य है, यों उपसंहार करते हैं। इसलिए प्…
- Verse 8अन्य मत के खण्डित होने पर अब अवशिष्ट अपने सिद्धान्त को दिखलाते हैं। इसलिए हे श्रीरामचन्द्…
- Verse 9हे श्रीरामचन्द्रजी, जब इस जगत का अत्यन्त अभाव ही है, तब सम्पूर्ण जगत ब्रह्म ही है, उससे अ…
- Verse 10श्रुति के निषेध से पहले जगत के घट, पट आदि मुद्गर प्रहार आदि से नाश द्वारा और अन्य वस्तु क…
- Verse 11जब दृश्य काम, कर्म, वासना आदि बीजों के साथ नष्ट हो जाता हे तब इस जगत का आत्यन्तिक उच्छेद…
- Verse 12दृश्य के उपशम में अधिष्ठान साक्षात्कार से दृश्य का सर्वथा बाध होना ही एकमात्र युक्ति हे ।…
- Verse 13जब जगत के तत्त्व के साक्षात्कार से चिदाकाश का बोध हो जाता है यानी बोधैकरस चिदात्मा ही है,…
- Verses 14–18पृथिवी आदि में भी चित्रकथान्याय को ही दशति हैं। ये पर्वत आदि, ये पृथिवी आदि, ये वर्ष आदि,…
- Verse 19ऐसी अवस्था में मनरूप परिच्छेद से पीडित हुई चिति अपने अन्तर्गत जगत को मानो उगलती है, ऐसा क…
- Verse 20स्फटिक शिला के भीतर नेत्र-दोष से दिखाई दे रही रेखाओं के तुल्य पदार्थ भेद नहीं है, ऐसा कहत…
- Verse 21जैसे निराकार आकाश में निराकार आकाशभाग स्फुरित होते हे, वैसे ही निर्मल आत्मा में ये सृष्टि…
- Verses 22–23जल के द्रवत्व के समान, वायु स्पन्द के समान, समुद्र के आवर्तो के समान, गुणी के गुणों के सम…
- Verse 24ऐसी अवस्था में सहकारी कारणों के न रहने पर कर्ता के विद्यमान रहने पर भी उत्पत्ति आदि की सि…
- Verse 25जिनका सम्पूर्ण पदार्थों की कल्पनारूपी कलंक दूर हो गया है, सब पदार्थो के स्वप्नदर्शन में क…