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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 2, Verses 14–18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 2, verses 14–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 14-18

संस्कृत श्लोक

इदमद्यादि पृथ्व्यादि तथेदं वत्सरादि च । अयं कल्पः क्षणश्चायमिमे मरणजन्मनी ॥ १४ ॥ अयं कल्पान्तसंरम्भो महाकल्पान्त एष सः । अयं स सर्गप्रारम्भो भाव्यभावक्रमस्त्वसौ ॥ १५ ॥ लक्ष्माणीमानि कल्पानामिमा ब्रह्माण्डकोटयः । एते चेमे परिगता इमे भूय उपागताः ॥ १६ ॥ इमानि धिष्ण्यजालानि देशकालकला इमाः । महाचित्परमाकाशमनावृतमनन्तकम् ॥ १७ ॥ यथापूर्वं स्थितं शान्तमित्येवं कचति स्वयम् । परमाणुसहस्रांशुभास एता महाचितेः ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

पृथिवी आदि में भी चित्रकथान्याय को ही दशति हैं। ये पर्वत आदि, ये पृथिवी आदि, ये वर्ष आदि, यह कल्प, यह क्षण, ये जन्म-मरण, यह प्रलय का आडम्बर, यह महाकल्पान्त, पुराण आदि में प्रसिद्ध सृष्टव्य आकाश आदि का सृष्टिक्रम, ये कल्पो के लक्षण, ये वर्तमान करोड़ों ब्रह्माण्ड, ये अतीत करोड़ों ब्रह्माण्ड, ये पुनः उत्पन्न हुए करोड़ों ब्रह्माण्ड, ये चौदह प्रकार से भिन्न देव, मनुष्य आदि के भिन्न-भिन्न लोक, ये सप्त द्वीपआदि देशों की तथा कृत, त्रेता, द्वापर आदि कालों की कल्पनाएँ अनन्त, अनावृत महा चिदाकाश ही हैं । इस प्रकार से वर्णित चित्रकथा के न्याय से परमाकाश ही अपने में स्वयं स्फुरित होता है । वह यथा पूर्वस्थित ओर शान्त है । जैसे झरोखे के छिद्र से भीतर आये हुए परमाणुओं में सूर्य की प्रभा परिच्छिन्न है वैसे ही मन से निकले हुए करोड़ों ब्रह्माण्डो में परिच्छिन्न ये चित्त की प्रभाएँ हैँ । जैसे आकाश में विस्तृत सूर्य प्रकाश में विभिन्न परमाणुओं के भ्रमण आदि नहीं दिखाई देते वैसे ही महाचितपरमाकाश में इनका भ्रमण नहीं दिखाई देता हे