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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 2, Verse 25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 2, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

प्रशान्तसर्वार्थकलाकलङ्को निरस्तनिःशेषविकल्पतल्पः । चिराय विद्रावितदीर्घनिद्रो भवाभयो भूषितभूः प्रबुद्धः ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

जिनका सम्पूर्ण पदार्थों की कल्पनारूपी कलंक दूर हो गया है, सब पदार्थो के स्वप्नदर्शन में कारण होने से विकल्परूपी शय्या जिन्होंने छोड़ दी है तथा जिन्होंने विकल्परूपी शय्या बिछानेवाली अविद्या को आत्मतत्त्व के साक्षात्कार से हटा दिया है, ऐसे ज्ञानवान आप निर्भय तथा ब्रह्मवेत्ताओं की सभा भूमि को भूषित करनेवाले होइये