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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 2, Verses 1–3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 2, verses 1–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 1-3

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अथैतदभ्युपगमे वच्मि वेद्यविदां वर । समस्तकलनातीते महाचिद्व्योम्नि निर्मले ॥ १ ॥ जगदाद्यङ्कुरस्तत्र यद्यस्ति तदसौ तदा । कैरिवोदेति कथय कारणैः सहकारिभिः ॥ २ ॥ सहकारिकारणानामभावे त्वङ्कुरोद्गतिः । वन्ध्याकन्येव दृष्टेह न कदाचन केनचित् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है, ऐसा कहते हैं । (सदेव सोम्येदमग्र आसीत्‌" इत्यादि श्रुतिवाक्य से विरोध होगा । यहाँ पर यह विचार करना चाहिये कि क्या कार्य ही सत्‌ है, कार्य की सत्ता ही कारणता में आरोपित है, ऐसा श्रुति कहती है या कारण ही सत्‌ है, कारण की सत्ता ही कार्य में आरोपित है, ऐसा श्रुति कहती है अथवा सत्‌ ही सत्‌ है, सत्‌ की सत्ता ही कार्य ओर कारण दोनो में आरोपित है, ऐसा श्रुति कहती है ? तीन पक्षों में साख्य का बोध यदि प्रथम पक्ष के अनुसार हो, तो वह भ्रम ही है, क्योकि उस पक्ष में "वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्‌“ इत्यादि कार्य को असत्‌ कहनेवाली श्रुति अनुकूल नहीं है ओर कारण को असत्‌ कहने से अपने सिद्धान्त का भी वाध होता है, ऐसा कहते है । कारण के गुणों के असत्य होने से वह महदादि कार्य किन कारणों से उत्पन्न होगा । जब कारण ही नहीं है तब कार्य उत्पन्न ही नहीं हो सकता । अतएव कारण ही सत्‌ है कारण की सत्ता ही कार्य में आरोपित है, यह द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योकि कार्य के अभाव में तद्घटित तत्‌-तत्‌ कारणता का निरूपण नहीं हो सकता | अतः परिशेषात तीसरा ही कल्प उचित हे ओर युक्ति-युक्त भी है, ऐसा उत्तर श्लोक से कहते हैं ॥ ३ ५॥ इसलिए यानी कार्य ओर कारण के भेद की सत्यता श्रुतिसम्मत नहीं हे । अतः सांख्यवादियों द्वारा कल्पित कार्यकारण भाव को उनके सहकारी कारण, निमित्त, प्रयोजन आदि भेदों के साथ दूर करके (ये असत्‌ हे यों खण्डन करके) जो कुछ अवशिष्ट आदि, मध्य ओर अन्त से रहित सन्मात्र वस्तु है, वही जगद्रूप से अव स्थित है उससे अतिरिक्त कुछ नहीं है, ऐसा जानिये ॥ ३ ६॥ पहला सर्ग समाप्त दूसरा सर्ग युक्तियों से स्वरूपभेदवश जगत की स्थिति का खण्डन करके अवशिष्ट पूर्णानन्दस्वरूपमात्र की स्थिति का वर्णन | श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे ज्ञानियों मे श्रेष्ठ श्रीरामजी, प्रलयकाल में इस जगत का पृथक्‌ अस्तित्व मानने में दोषों को कहता हूँ। यदि कोई शंका करे कि यदि प्रलय में जगत नहीं है, तो सृष्टि ही सिद्ध नहीं हो सकती, क्योकि उत्पत्ति क्रिया किसी कर्ता से होती है। कर्ता भी नहीं है। यदि कहिये ब्रह्म ही सत्‌ होने से कर्ता है, तो वही उत्पन्न होगा न कि जगत उत्पन्न होगा । कूटस्थ ब्रह्म का उत्पत्ति आदि विकारों से सम्बन्ध नहीं हो सकता, इसलिए उत्पत्ति की सिद्धि के लिए प्रलय में जगत की सत्ता अवश्य माननी चाहिये, इस आशंका का अनुवाद कर खण्डन करते हैं। सब कल्पनाओं से रहित निर्मल महाचिदाकाश में यदि जगदादि अंकुर है, तो प्रलय के बाद में किन सहकारी कारणों से वह उदित होता है, उन्हें आप कहिये | सहकारी कारणों के अभाव में जगद्रूप अंकुर की उत्पत्ति वन्ध्या की कन्या के समान किसी ने कहीं पर नहीं देखी है