Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 2, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 2, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
इमे सर्गाः प्रस्फुरन्ति स्वात्मनात्मनि निर्मले ।
नभसीव नभोभागा निराकारा निराकृतौ ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे
निराकार आकाश में निराकार आकाशभाग स्फुरित होते हे, वैसे ही निर्मल आत्मा में ये सृष्टियाँ
अपने-आप स्फुरित होती हैं। जैसे आकाश से आकाश भाग की पृथक् सत्ता नहीं है वैसे ही आत्मा
की सत्ता से इन सृष्टियों की पृथक् सत्ता नहीं है, यह दर्शाने के लिए “नभसीव' दृष्टान्त दिया
है