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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 2, Verse 19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 2, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

स्वयमन्तश्चमत्कारो यः समुद्गीर्यते चिता । तत्सर्गभानं भातीदमरूपं नतु भित्तिमत् ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

ऐसी अवस्था में मनरूप परिच्छेद से पीडित हुई चिति अपने अन्तर्गत जगत को मानो उगलती है, ऐसा कहते है । चिति स्वयं ही अपने अन्दर विद्यमान जो जगद्रूप चमत्कार हे, उसको उगलती है । वही सृष्टिरूप से प्रतीत होती है । यह रूपरहित ओर भित्ति रहित है