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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 2, Verse 13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 2, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

चिदाकाशस्य बोधोऽयं जगद्भातीति यत्स्थितम् । अयं सोऽहमिदं नाहं लोके चित्रकथा यथा ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

जब जगत के तत्त्व के साक्षात्कार से चिदाकाश का बोध हो जाता है यानी बोधैकरस चिदात्मा ही है, अणुमात्र भी अचिद्रूप नहीं है, ऐसा परिनिष्ठित ज्ञान हो जाता है तब (देवदत्त नामक) विशिष्ट माता-पिता से उत्पन्न प्रत्यभिज्ञायमानदेह ही मेँ हू, परकीय देह, दीवार आदि मैं नहीं हूँ, इस प्रकार लोक में प्रसिद्ध पामर जनों का व्यवहार चित्रकथा के तुल्य हो जाता हे । अर्थात्‌ जैसे दीवार मेँ लिखा गया चित्र सभी की दृष्टि में परमार्थरूप से एकमात्र दीवाररूप ही है तथा चित्रगृह की दीवार में यह दीवार है, ऐसा व्यवहार नहीं होता वैसे ही यह पूर्वोक्त व्यवहार हे