Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 2, Verses 22–23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 2, verses 22–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 22,23
संस्कृत श्लोक
द्रवत्वानीव तोयस्य स्पन्दा इव सदागतौ ।
आवर्ता इव चाम्भोधेर्गुणिनो वा यथा गुणाः ॥ २२ ॥
विज्ञानघनमेवैकमिदमेवमवस्थितम् ।
सोदयास्तमयारम्भमनन्तं शान्तमाततम् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
जल के द्रवत्व के समान, वायु स्पन्द के समान, समुद्र के आवर्तो के समान, गुणी के गुणों
के समान, उत्पत्ति और विनाश से युक्त यह सारा जगत उक्त दृष्टान्तो के अनुसार सर्वत्र व्याप्त
शान्त ब्रह्म ही विस्तृत है, भाव यह है कि जैसे द्रवत्व जल से पृथक् नहीं हे, स्पन्द वायु से पृथक्
नहीं है, आवर्तं समुद्र से पृथक् नहीं है ओर गुण गुणी से पृथक् नहीं है वैसे ही यह उत्पत्ति विनाशशील
जगत अनन्त, शान्त ब्रह्म ही है, उससे पृथक् नहीं हे