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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 2, Verse 24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 2, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

सहकार्यादिहेतूनामभावे शून्यतो जगत् । स्वयंभूर्जायते चेति किलोन्मत्तकफूत्कृतम् ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

ऐसी अवस्था में सहकारी कारणों के न रहने पर कर्ता के विद्यमान रहने पर भी उत्पत्ति आदि की सिद्धि नहीं होती है, अतः सांख्यो की जो कल्पना है, वह उन्मत्त की चेष्टा के तुल्य है, यों उपसंहार करते हैं। उत्पत्ति के पहले पृथक्रूप से स्वीकृत भी पदार्थ सहकारी आदिकारणों के अभाव में शून्यकल्प प्रधान से उत्पन्न होता है, यह कथन उन्मत्तपुरुषों के फूत्कार के तुल्य है