Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 66
पैंसठवाँ सर्ग समाप्त छासठवाँ सर्ग द्वैत की केवल मनोमात्रता तथा इष्ट वस्तु के त्याग से ओर ज्ञान से अज्ञानसहित मन के क्षय का वर्णन |
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- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रकार जैसे दीपक से अनेकता को प्राप्त हुए सौ…
- Verse 2जैसे चित् के अधीन जीवत्व की कल्पना से बन्ध होता है, वैसे ही चित्त के अधीन विचार ओर तत्त्…
- Verse 3यदि कोई शंका करे कि विचार से चित्त की शान्ति होने पर कैसे सब द्वैत की शान्ति होती है ? जी…
- Verse 4जैसे केले के वृक्ष में पत्तों को छोड़कर और कुछ भी नहीं रहता, वैसे ही जगत् में भी केवल भ्…
- Verse 5पैदा होता है, बालक बनता है, जवान होता है, फिर बुढ़ापे को प्राप्त होता है, मरण, स्वर्ग और…
- Verse 6जैसे आकाश में अनेक हजार बुद्बुदके आकार की भ्रान्ति उत्पन्न करने में शराबकी सामर्थ्य है, व…
- Verse 7जैसे मल से कलुषित नेत्र एक चन्द्र में द्वित्व देखता है, वैसे ही चित्तकी कला यानी भ्रान्ति…
- Verse 8जैसे शराब आदि के नशे में मस्त हुआ पुरूष नशे के कारण वृक्षों को घूमते हुए देखता है, वैसे ह…
- Verses 9–10जैसे बालक खेलकूद में भ्रमण से जगत् को कुलालके चाक के समान घूमता हुआ देखते हैं, वैसे ही ज…
- Verse 11जिसका अनुभव होता है, वह चित्से अतिरिक्त जड़रूप नहीं है, यानी प्रतीतिकाल में भी द्वैतसत्ता…
- Verse 12पुरूष जीवन्मुक्त कब होता है, इस शंका पर कहते हैं। जब पुरूष चिद्घन परमात्मा से एकता को प्र…
- Verse 13अल्पज्ञ जीवकी चिद्घन के साथ एकता होने पर सर्वज्ञता ही होगी निर्विषयतारूप संशान्ति नहीं हो…
- Verse 14जिसका ध्यान निरन्तर चिद्घन के सिवा अन्य विषयमें नहीं रहता है, अतएव चिद्घनरूप परमपदमें आरू…
- Verse 15चित् में चेत्यता, जडता, संसारिता आदिकी कल्पना भी चित्त के कारण ही होती है, चित्तके शान्त…
- Verse 16चेतन चित्त के व्यापारस्वभावसे अतिरिक्त नहीं है, वह समाधि तथा ज्ञानके अभ्यास से भले ही उपर…
- Verse 17चित् से जिस किसीका अनुभव होता है, वह चेत्य हे, रज्जु में सर्पभ्रम के तुल्य प्रतीत होनेवा…
- Verses 18–19इस संसारनामक व्याधिका केवल ज्ञानमात्र से प्रतीकार हो सकता हे, यह चित्तका एक व्यापारमात्र…
- Verse 20जैसे सम्यग्-दर्शन से रज्जु में सर्पभ्रम निवृत्त हो जाता है, वैसे ही प्रत्यक्मुख होकर स्व…
- Verse 21जिस वस्तु की अभिलाषा हो, उसका सर्वथा त्याग कर यदि पुरूष से रहा जा सके, तो मोक्ष उसे प्राप…
- Verses 22–23जब इस संसार में महामहिमाशाली पुरुष अपने प्राणों का भी तृण के समान परित्याग कर देते हैं, त…
- Verse 24जैसे हाथ में रक्खा हुआ बिल्वफल अथवा सामने स्थित पर्वत सबके प्रत्यक्ष ही रहते हैँ, तिरोहित…
- Verse 25जैसे प्रलयकालीन एक असीम समुद्र तरंगों से अनेक प्रकार का प्रतीत होता है, वैसे ही अप्रमेय आ…