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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 66, Verse 13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 66, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 66 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

तन्वी चेतयते चेत्यं घना चिन्नाङ्ग चेतति । अल्पक्षीबः क्षोभमेति घनक्षीबो हि शाम्यति ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

अल्पज्ञ जीवकी चिद्घन के साथ एकता होने पर सर्वज्ञता ही होगी निर्विषयतारूप संशान्ति नहीं होगी, ऐसा यदि कोई कहे, तो उसपर कहते हैं। अत्यल्प चिति विषय का अनुभव करती है, घन चिति विषय का अनुभव नहीं करती है, जैसे कि थोड़ा पागल पुरूष का चित्त चमक उठता है, लेकिन अत्यन्त पागल व्यापारशुन्य होकर रहता है। भाव यह है कि चित्‌की सविषयता केवल चित्त्वसे नहीं होती किन्तु अविद्याविक्षेषयुक्त चित्त्ववश होती है । उक्त सविषयता ज्ञान तथा समाधिकी दृढता से उद्बुध्ध हुई चिद्घन की एकता से अविद्याविक्षेपके हट जानेपर दूर हो जाती है। जो ईश्वर आदिकी सर्वज्ञता है, वह भी मायिक ही है, वास्तविक नहीं है, अतः कोई दोष नहीं है