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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 66, Verse 15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 66, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 66 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

चिच्चेतनेन चेत्यत्वमेत्येवं पश्यति भ्रमम् । जातो जीवामि पश्यामि संसरामीत्यसन्मयम् ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

चित्‌ में चेत्यता, जडता, संसारिता आदिकी कल्पना भी चित्त के कारण ही होती है, चित्तके शान्त होने पर चितूमे उक्त चेत्यता, जडता आदि दूर हो जाते हैं ऐसा कहते हैं । चिति चित्त के व्यापार द्वारा ही चेत्यताको प्राप्त होती है और “भें उत्पन्न हूँ, जीवित हूँ, देखती हूँ, संसार को प्राप्त होती हूँ”, इस प्रकारके असत्य भ्रमको देखती हे