Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 66, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 66, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 66 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
यथाभूतमसद्रूपमात्मानं यदि पश्यति ।
विचार्यतेऽन्तस्तदनुभावहीनं न शोचति ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे चित् के अधीन जीवत्व की कल्पना से बन्ध होता है, वैसे ही चित्त के अधीन विचार
ओर तत्त्वज्ञान से मुक्ति भी होती है, इस गूढ आशय से कहते हैँ ।
यदि पुरुष अपने अन्तःकरण मेँ द्वित के आग्रह से रहित, यथास्थित (अनारोपितरूप)
तथा नामरूप से शून्य आत्मा का विचार करता है, तो वह वैसा ही उसे देखता है, तब वह शोक
नहीं करता