Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 66, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 66, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 66 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एवमेकं परं वस्तु राम नानात्वमेत्यलम् ।
नानात्वमिव संजातं दीपाद्दीपशतं यथा ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रकार जैसे दीपक से अनेकता को प्राप्त हुए
सौ दीपक होते हैं, वैसे ही अद्वितीय परम वस्तु (चिदात्मा) ही अनेकता को प्राप्त होता है ।
अथवा केवल चेत्य (विषय) ही अनेक नहीं हुआ है, किन्तु पूर्वोक्त रीति से चित् में प्रत्येक
उपाधि के भेद से अनेकत्व-सा हो गया है
सर्ग सन्दर्भ
पैंसठवाँ सर्ग समाप्त छासठवाँ सर्ग द्वैत की केवल मनोमात्रता तथा इष्ट वस्तु के त्याग से ओर ज्ञान से अज्ञानसहित मन के क्षय का वर्णन |