Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 66, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 66, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 66 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
आत्मैव भाति जगदित्युदितस्तरङ्गैः कल्पान्त एक इव वारिधिरप्रमेयः ।
ज्ञातः स एव हि ददाति विमोक्षसिद्धिं त्वज्ञात एव मनसे चिरबन्धनाय ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे प्रलयकालीन एक असीम
समुद्र तरंगों से अनेक प्रकार का प्रतीत होता है, वैसे ही अप्रमेय आत्मा ही जगद्रूप से आविर्भूत
होकर अज्ञ लोगों की दृष्टि से प्रतीत हो रहा है, वही ज्ञान से अभिव्यक्त होकर मोक्षरूप
पुरुषार्थ को देता है ओर अज्ञात होकर पहले तो सम्पूर्ण अनर्थके कारणभूत चित्तता (मनोभाव)
के लिए होता है, तदनन्तर चिरबन्धन के लिए होता हे