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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 66, Verses 9–10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 66, verses 9–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 66 · श्लोक 9,10

संस्कृत श्लोक

यथा लीलाभ्रमाद्बालाः कुम्भकृच्चक्रवज्जगत् । भ्रान्तं पश्यन्ति चित्तात्तु विद्धि दृश्यं तथैव हि ॥ ९ ॥ यदा चिच्चेतति द्वित्वं तदा द्वैतैक्यविभ्रमः । यदा न चेतति द्वैतं तदा द्वैतैक्ययोः क्षयः ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे बालक खेलकूद में भ्रमण से जगत्‌ को कुलालके चाक के समान घूमता हुआ देखते हैं, वैसे ही जीव चित्त से इस दृश्य को देखते हैं, इसमें सन्देह नहीं है । जब जीवचिति द्वित्वका अनुभव करती है, तब द्वित और ऐक्य का भ्रम होता है । जब चिति द्वैत का अनुभव नहीं करती तब द्वैत ओर एेक्यका विनाश हो जाता है