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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 66, Verses 22–23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 66, verses 22–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 66 · श्लोक 22,23

संस्कृत श्लोक

अपि प्राणांस्तृणमिव जयन्तीह महाशयाः । यत्राभिलाषस्तन्मात्रत्यागे कृपणता कथम् ॥ २२ ॥ यत्राभिलाषस्तत्त्यक्त्वा चेतसा निरवग्रहम् । प्राप्तं कर्मेन्द्रियैर्गृह्णस्त्यजन्नष्टं च तिष्ठ भोः ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

जब इस संसार में महामहिमाशाली पुरुष अपने प्राणों का भी तृण के समान परित्याग कर देते हैं, तब जिस वस्तु की केवल अभिलाषा है, उस वस्तुका परित्याग करने में कृपणता केसी ? जिस वस्तु की अभिलाषा हो, उस वस्तु का अपने चित्त से परित्याग कर प्राप्त वस्तु का कर्मेन्द्रियों से आसक्तिरहित होकर ग्रहण करते हुए और नष्ट वस्तु का शोक न करते हुए आप स्थित रहिए