Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 66, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 66, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 66 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
चित्तमात्रं नरस्तस्मिन्गते शान्तमिदं जगत् ।
उपानद्गूढपादस्य ननु चर्मास्तृतैव भूः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि विचार से चित्त की शान्ति होने पर कैसे सब द्वैत की शान्ति
होती है ?
जीव चित्तमात्र ही है, चित्त से अतिरिक्त नहीं है, चित्त के हट जाने पर यह जगत् शान्त
(विनष्ट) हो जाता है, जैसे जिस पुरूष के चरण जूते से आवृत्त रहते हैं, वह समझता है कि
सारी पृथिवी चमड़े से आच्छन्न है वैसे ही जिसका चित्त से छुटकारा हो जाता है उसकी दृष्टि
में जगत् असत् है