Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 61
30 verse-groups
- Verse 1केवल विशुद्ध बोधमात्रस्वरूपवाले ब्रह्म की स्वरूपभूत विभा (प्रकाश) ही जैसे आकाश में उसकी अ…
- Verse 2यद्यपि महाकल्पान्तसर्गादौ चित्स्वभावमिदं वपु: इत्यादि से इसे आप कह चुके है, तथापि जिन युक…
- Verse 3यदि किसीको यह शंका हो कि चैतन्य के अन्दर प्रतीत होनेमात्र से सव पदार्थो की सवत्मिता कैसे…
- Verse 4पूर्वोक्त रीती से चिद् में भेद का निरास होने पर जड़ के भेद का निरास करना भी कठिन नहीं है…
- Verse 5जगत् के चित् से अभिन्न होने पर भी यदि कोई प्रश्न करे कि कारण के बिना जगत् कैसे उत्पन्न…
- Verse 6यदि कोई शंका करे कि एक की अनेकात्सता मे विरोध होगा, तो उस पर समानसत्तावाले अनेक अवयवो के…
- Verse 7तो सबके अनुभव से सिद्ध जगत्” ओर 'अहम्” ऐसी भेदप्रतीति कैसे होती है ? इस पर कहते हैं। सब…
- Verse 8जैसे स्फटिकशिला के भीतर, भेद न होने पर भी प्रतिबिम्बित वनपंक्तियों की स्थिति विरुद्ध नहीं…
- Verse 9जैसे तरंगशून्य जल के अन्दर तरंगें स्थित हैं, वैसे ही सृष्टिशब्दार्थ से शून्य परब्रह्म के…
- Verse 10यदि किसीको यह जिज्ञासा हो कि जैसे विलीन तरगे महाजल मे अवयवरूप से रहती हैं अथवा अवयवी समवा…
- Verse 11द्रष्टि-सृष्टिवाद के उपपादनक्रम से भी जगत् की चित् से अभिन्नता का अनुभव श्रीवसिष्टजी कर…
- Verse 12उसी समय अपने कारण में लीन हुए शब्दतन्मात्रा का आकाशरूप से आविभवि होता है। यह शब्दतन्मात्र…
- Verse 13वही (आकाशता को प्राप्त हुआ ब्रह्म ही) स्वयं अपने में स्वसत्तात्मक वायुता का, जिसके अन्दर…
- Verse 14पवनात्मा को प्राप्त हुआ ब्रह्म ही स्वयं अपनी सत्तात्मक तेजस्ताको, जिसके मध्य में तेजस्तन्…
- Verse 15तेजस्ता को प्राप्त हुआ ब्रह्म ही स्वयं निजसत्तात्मक जलत्व को, जिसके अन्दर रसतन्मात्रा स्थ…
- Verses 16–17यदि को शंका करे कि जिस क्षण में नेत्रों के पलक खोलते हैं, उसी क्षण में तुरन्त ही जगत् का…
- Verse 18जो अशुद्ध, जड, देश और काल से परिच्छिन्न, दोषयुक्त, उत्पत्तिविनाशशील और काल में स्थित है,…
- Verse 19यदि कोई कहे कि उसके मध्य में यदि सृष्टि और प्रलय निहित है, तो अपवर्ग भी सृष्टियुक्त या प्…
- Verse 20चैतन्यरूप जो ब्रह्म है, उसको ज्ञानी लोग अपने आत्मरूप से अपने में जैसा जैसा जानते हैँ, वैस…
- Verse 21जगत् भी यदि शास्त्रीय चिदृविलासरूप दृष्टि से देखा जाय, तो परमार्थ सत्य ब्रह्म ही है । ब्…
- Verse 22जैसे वायु में चलन से पहले असत् के तुल्य वायु में आविर्भाव होने से सत् के तुल्य स्थित है…
- Verse 23जैसे तेज के अन्दर आलोकता (चमक) अनन्य (अभिन्न) होती हुई भी भिन्न प्रतीत होती है, वैसे ही च…
- Verses 24–25जैसे खिलौना बनाने के लिए तैयार की गई गीली मिट्टी मे न बनाये गये खिलौने रहते हैं, जैसे खिल…
- Verse 26भ्रमवश चिदाभासरूप जीव बना हुआ ब्रह्म सर्ग को ही अपना आत्मा जानता है ओर तत्त्वदुष्टि से पर…
- Verses 27–30जैसे दूध में मिठास, मिर्च में कड्वापन, पानी में तरलता (द्रवता) और वायु मेँ चलन अभिन्नरूप…
- Verses 31–32यदि यह जगत् अकारण ही है, तब तो उत्पन्न ही नहीं हुआ, फिर उसका अनुभव कैसे होता है ? वासना,…
- Verse 33जब तक चित्त रहेगा, तब तक परमाणु के पेट में भी सृष्टि की परम्परा का निवारण नहीं किया जा सक…
- Verses 34–35यदि पुरुष की भोगों के प्रति तनिक भी अरूचि हो गई, तो वह उतने से ही ऊँचे पद को प्राप्त हो ग…
- Verse 36जो लोग परा (ईश्वर- चैतन्यरूप) अपरा (जीवचैतन्यरूप) क्रमश: ईश्वरचैतन्यरूप परा चिति को नामरू…
- Verses 37–38परब्रह्म में व्यष्टि जीवरूप प्रकट अद्वितीय "चिति" ऐसे रहती है, जैसे द्रवभूत जल के अन्दर आ…