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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 61, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 61, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

कटकत्वं पृथग्हेम्नस्तरङ्गत्वं पृथग्जलात् । यथा न संभवत्येवं न जगत्पृथगीश्वरात् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्वोक्त रीती से चिद्‌ में भेद का निरास होने पर जड़ के भेद का निरास करना भी कठिन नहीं है, क्योकि जड़ भेद की सत्ता और स्फूर्ति चित्‌ से अतिरिक्त नहीं है, ऐसा दृष्टान्तपूर्वक कहते हैं। जैसे कटकता सुवर्ण से पृथक्‌ नहीं है और जैसे तरंगता जल से पृथक्‌ नहीं है, वैसे ही जगत्‌ भी ईश्वर से पृथक्‌ नहीं है