Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 61, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 61, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
यथैतत्सरणं वायौ तथा सर्गः स्थितः परे ।
असत्कल्पेऽपि संकल्पः सत्येऽसत्य इवापि च ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे वायु में चलन से पहले असत् के
तुल्य वायु में आविर्भाव होने से सत् के तुल्य स्थित है, चलन के समय वायु की सत्ता का
परिज्ञान होने से सत्य वायु में केवल स्थिरता से रहने के कारण असत्य-सा स्थित रहता है,
वैसे ही यह सृष्टि भी असत्रूप मूल अज्ञान में अधिष्ठानसत्ता से सत्कल्प तथा सत्य भी
अधिष्ठान में असत्य मायारूप होने से असत्य सी स्थित है