Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 61, Verses 34–35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 61, verses 34–35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 34,35
संस्कृत श्लोक
जाता चेदरतिर्जन्तोर्भोगान्प्रति मनागपि ।
तदसौ तावतैवोच्चैः पदं प्राप्त इति श्रुतिः ॥ ३४ ॥
यतो यतो विरज्यते ततस्ततो विमुच्यते ।
अतोऽहमित्यसंविदन्क एति जन्मसंविदम् ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि पुरुष की भोगों के प्रति तनिक भी अरूचि हो गई, तो वह उतने से ही ऊँचे पद को
प्राप्त हो गया, ऐसा श्रुति कहती है । स्मृति को भी उद्घृत करते हैं।
पुरुष जैसे-जैसे विरक्त होता है वैसे वैसे मुक्त होता है, इसलिए (ज्ञान-वैराग्य की
दढता से) “अहम् इस प्रकार देह आदि का ज्ञान न करता हुआ यानी उनको न देखता हुआ
कौन जन्ममरण भ्रान्ति को प्राप्त होगा, कोई भी नहीं