Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 61, Verses 16–17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 61, verses 16–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 16,17

संस्कृत श्लोक

तदेदावनितां वेत्ति स्वचित्तैकात्मतामयीम् । अन्तःस्थगन्धतन्मात्रामुर्वी स्थैर्यकलामिव ॥ १६ ॥ तुल्यकालनिमेषांशलक्षभागप्रतीति यत् । निजं विदः प्रकचनं तत्सर्गौघपरम्परा ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि को शंका करे कि जिस क्षण में नेत्रों के पलक खोलते हैं, उसी क्षण में तुरन्त ही जगत्‌ का भान होता है । इस भान में आरोपक्रम की प्रतीति नहीं होती, ऐसी अवस्था में दृष्टिसृष्टि की उपपत्ति कैसे ? इस पर कहते हैं। यह चित्‌ का चमत्कार ऐसा है कि इसकी प्रतीति का तराजू में जोखे हुए की नाईं कठिनाई से लक्ष्य करने योग्य निमेष के लाखवें हिस्से के तुल्य है, इस तरह का भी जो संवित्‌ का जगदाकार स्फुरण है, वह करोड़ों कल्पो तक रहनेवाली सृष्टियों की परम्परा बन जाता हे । चित्‌ के स्फुरण मेँ काल से अपरिच्छिन्न निमेष के लक्षतम (लाखवें) हिस्से का आरोप अथवा करोड़ों कल्पो का आरोप मायिक है, इसलिए वास्तविक में उसमें कोई विरोध नहीं हे, यों आरोपक्रम की कल्पना हो सकती हे, यह भाव हे