Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 61, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 61, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
समस्ताः समतैवान्ताः संविदो बुध्यते यतः ।
सर्वथा सर्वदा सर्वं सर्वात्मकमजस्ततः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि महाकल्पान्तसर्गादौ चित्स्वभावमिदं वपु: इत्यादि से इसे आप कह चुके है, तथापि
जिन युक्तियो के द्वारा ठीक ठीक समझ में आ जाय, उन युक्क्तियों से मुझसे किये, यह भाव
है । जितनी भी भ्रान्तियाँ है वे सव स्वरूपचैतन्य के मध्य में सन्निविष्ट हैं, इसी मुख्य युक्ति
को पहले श्रीवसिष्ठजी कहते है ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, चूँकि ज्ञानी सब प्रकार की सकल भ्रान्तियों
को स्वरूपचैतन्य के अन्दर ही स्थित सदा जानता है, कभी भी उससे अतिरिक्त कोई भी
भ्रान्तिर्यो नहीं हे, अतः सब सर्वात्मक ही हे । वह समता ही है । सबके सर्वात्मक होने पर तनिक
भी विषमता शेष नहीं रहती । जब विषमता नहीं हे, तब जन्म आदि विकारों की उपपत्ति
कहाँ ? इसलिए अज (परमात्मा) ही वस्तुतः है, इस जगत् की भ्रान्ति कारण बिना हुई हे, ऐसा
जो कहा, वह ठीक ही कहा, यह भाव है