Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 61, Verses 37–38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 61, verses 37–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
परे चितिः स्वप्रकटाद्वितीयास्वावर्तलेखेव जले द्रवान्तः ।
साहं तयेमानि जगन्ति धत्ते न सन्ति नासन्ति परात्मकानि ॥ ३७ ॥
अहंमयी पद्मजभावना चित् संकल्पभेदाद्वितनोति विश्वम् ।
अन्तर्मुखैवानुभवत्यनन्तनिमेषकोट्यंशविधौ युगान्तम् ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
परब्रह्म में व्यष्टि जीवरूप प्रकट अद्वितीय "चिति" ऐसे रहती है, जैसे द्रवभूत जल के
अन्दर आवर्तं की रेखा रहती है, वही अहंकार से युक्त होकर इन जगतों को धारण करती है,
परमात्मा में न तो जगत् सद्रूप है ओर न असद्रूप हे । व्यष्टि के तुल्य समष्टि में भी अहंकार और
संकल्प से-इन दोनों के कारण ही-अपने भीतर संसार की कल्पना होती हे, ऐसा दिखलाते
हुए उपसंहार करते हैं