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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 4

20 verse-groups

  1. Verses 1–9चौथा सर्ग मुनिश्रेष्ठ श्रीवसिष्ठजी के उपदेश को सुनने के उपरान्त सभा का विसर्जन, रात्रिके…
  2. Verse 10इसी समय द्वारपाल सभा में आकर बड़े विनम्रभाव से महाराज दशरथ से बोला : देव स्नान, ब्राह्मण…
  3. Verses 11–20तदुपरान्त श्रीवसिष्ठजी ने अपनी मधुर वाणीका उपसंहार कर महाराज से कहा : महाराज, आज आप लोग इ…
  4. Verses 21–22फूले हुए पलाश के वनों से पूर्ण वसन्तशोभा के समान उदित हुई तारागणोँ को धारण करनेवाली सन्ध्…
  5. Verses 23–37कुछ-कुछ, केसर की कान्ति के समान सुनहली सूर्य की कान्ति से सुशोभित मेघखण्डरूपी पीले वस्त्र…
  6. Verse 38श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे शून्य ओर जड आकारवाले भूताकाश का नाममात्र क…
  7. Verses 39–40मन की आकाशतुल्यता का ही उपपादन करते है । हे रामजी, प्रस्तावित मन क्या बाहर ओर क्या हृदय म…
  8. Verses 41–42यद्यपि परमार्थरूप से मन है ही नहीं, तथापि शास्त्रीय व्यवहार के लिए कल्पित उसका रूप कहते ह…
  9. Verse 43भाव यह कि निराकार चित्‌ का जो पदार्थाकार अध्यास है, वही मन है । सामान्य वृत्तियों से उसका…
  10. Verse 44उक्त बात को ही विषयभेदव्यवस्था के प्रदर्शन द्वारा दृढ़ करते हैं । हे श्रीरामजी, जिस विषय…
  11. Verse 45यदि कोई कहे कि चित्‌से संवलित वृत्ति ही पदार्थभान कहा जाता है, ऐसी परिस्थिति में चित्‌ के…
  12. Verse 46यदि सर्वपदार्थाकार मन ही ब्रह्मा की देह है, तो उसकी अन्य प्रष्टव्य वस्तु ही क्या रही, इस…
  13. Verse 47अविद्या, संसार, चित्‌, मन, बन्धन, मल, तम-ये सब दृश्य के पर्यायवाची शब्द हैं, ऐसा विद्वान्…
  14. Verses 48–58दृश्य से अतिरिक्त मन का कुछ भी स्वरूप नहीं है, यदि उत्पन्न दृश्य ही अविद्या और मन है, तो…
  15. Verses 59–60श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, यह दृश्य यदि सत्‌ है, तो इसकी निवृत्ति नहीं हो सकेगी, क्…
  16. Verse 61यद्यपि जगत्‌ असरत्‌ है, तथापि अविद्या से वह सत्‌-सा प्रतीत होता है। केवलीभाव का साक्षात्क…
  17. Verses 62–64परिणामवाद मे दोष दिखलाते हैं । हे राघव, जिस वस्तुका अस्तित्व है, उसका कदापि नाश नहीं हो स…
  18. Verse 65यह चिदात्मा स्वभिन्न प्रधान में स्थित दृश्य को अविवेक से अपने हृदय में स्थित देखता है, वह…
  19. Verses 66–74इसलिए अन्त में विवर्तवाद ही अवशिष्ट रहता है, ऐसा कहते हैं। इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी, आप अ…
  20. Verses 74–80श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स राघव, मेरा वचन पूर्वपरसमन्वय से रहित नहीं है तथा शब्द करनेवाले…